— नेत्रविक्रम बिमली

सीमाएं भूगोल को बांध सकती हैं, लेकिन भाषा, संस्कृति और दिलों की धड़कन को कभी नहीं बांध सकतीं। भारत के पश्चिम बंगाल स्थित सिलगुड़ी शहर के दिल से हर सुबह एक ऐसा भाषाई संकल्प उदित होता है, जो भारत में रहने वाले करोड़ों नेपाली भाषियों के स्वाभिमान को हिमालय की तरह ऊंचा उठाता है। उस अद्भुत और बहुमूल्य संकल्प का नाम है— ‘हिमालय दर्पण’।

जहां भारत के बाजारों में अंग्रेजी और हिंदी के तमाम समाचार पत्र पांच भारतीय रुपयों में आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं, वहीं नेपाली भाषा की आस्था का प्रतीक माना जाने वाला ‘हिमालय दर्पण’ उससे भी अधिक मूल्य पर गर्व के साथ बिकता है। यह सिर्फ किसी अखबार की कीमत नहीं है, बल्कि यह भारत में नेपाली भाषियों की सांस्कृतिक ऊंचाई, भाषाई गरिमा और पाठकों के अटूट जनविश्वास का जीवंत प्रमाण है। मूल्य के बाजार में ‘हिमालय दर्पण’ द्वारा कायम यह अनूठी शान अपने आप में एक ऐतिहासिक क्रांति है।
आज के डिजिटल युग में भी प्रतिदिन ५० हजार से अधिक प्रतियां प्रिंट होकर बिकना कोई साधारण बात नहीं है। सिलगुड़ी, सिक्किम, असम, डुवार्स से लेकर नेपाल के सीमावर्ती शहरों तक हर सुबह ‘हिमालय दर्पण’ के पन्ने पलटते ही अपनी भाषा और साहित्य की सौंधी महक आती है। यह अखबार प्रवास में रह रहे हर नेपाली भाषी को अपनी माटी, पहचान और अस्तित्व का बोध कराता है।
हाल ही में सिलगुड़ी यात्रा के दौरान ‘हिमालय दर्पण’ के मुख्य कार्यालय में कुछ पल बिताने का सौभाग्य मिला। भारतीय पत्रकार नरेंद्र छेत्री के आत्मीय सहयोग से जब हमने कार्यालय में प्रवेश किया, तो वहां केवल खबरों की आपाधापी ही नहीं थी—वहां अगाध नेपालीपन, प्रेम और भारतीय नेपाली भाषियों का सीना चौड़ा करने वाला गर्व स्पष्ट महसूस हो रहा था।
नेपाली भाषा, कला और साहित्य का संरक्षण करते हुए भारत की धरती पर नेपाली भाषियों की शान को निरंतर ऊंचा रखने में अहोरात्र जुटे संपादक शिबु छेत्री एवं संपूर्ण ‘हिमालय दर्पण’ टीम का योगदान इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा।
अपनी भाषा के दीपक को इस तरह प्रज्वलित रखना कोई मामूली साहस का काम नहीं है। ‘हिमालय दर्पण’ सिर्फ एक समाचार पत्र नहीं, बल्कि समस्त नेपाली भाषियों की धड़कन, पहचान और स्वाभिमान का साझा दर्पण है। इसकी यह अविरल यात्रा युगों-युगों तक नेपाली भाषा की शान को इसी तरह ऊंचा रखेगी।
